जंग-ए-उहुद शव्वाल 3 हिजरी (मार्च 625 ई.) में मदीना मुनव्वरा के करीब उहुद पहाड़ के दामन में मुसलमानों और कुरैश-ए-मक्का के बीच लड़ी गई: khabar 36 Garh is News Raipur Chhattisgarh

Mohammad Nazir Hossain chief editor

ख़बर 36 गढ़ न्यूज़ रायपुर: जबल-ए-उहुद के मैदान में रसूल अल्लाह स अ व के चचा हजरत हमजा और लगभग 70 शहीदों की कब्र मुबारक है। वहां जाने पर पता चलता है कि यह क्यों रसूल ﷺ के लिए ताइफ़ के बाद सबसे ज्यादा तकलीफ़ वाला साल था।
ग़ज़वा-ए-उहुद के बारे में बताया गया कि जब ग़ज़वा-ए-बदर में काफ़िर हार गए थे और उनके बड़े-बड़े सूरमा मारे गए थे।
जंग-ए-बदर भी अबू सूफ़ियान की वजह से हुई थी,
ग़ज़वा-ए-बदर में अबू सूफ़ियान का ससुर यानी हिन्दा का बाप उत्बा बिन रबीअह मारा गया।
उसका भाई वलीद बिन उत्बा मारा गया। उसका चचा शैबा बिन रबीअह भी मारा गया।
अब उन्होंने बदला लेने की ठान ली।
जंग-ए-उहुद शव्वाल 3 हिजरी (मार्च 625 ई.) में मदीना मुनव्वरा के करीब उहुद पहाड़ के दामन में मुसलमानों और कुरैश-ए-मक्का के बीच लड़ी गई।
कुरैश-ए-मक्का को ग़ज़वा-ए-बदर में शर्मनाक हार मिली थी और उनके बड़े-बड़े सरदार मारे गए थे। वे इस हार का बदला लेने और अपनी खोई हुई इज़्ज़त वापस पाने के लिए तड़प रहे थे।
अब मदीना के मुसलमानों की ताकत बढ़ने की वजह से मक्का के कारोबारी काफिलों का शाम जाना मुश्किल हो गया था, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ गई थी।
अब अबू सूफ़ियान की क़ियादत में मक्का से 3,000 का मुसल्लह लश्कर रवाना हुआ, जिसमें 200 घुड़सवार और 700 ज़िरहपोश शामिल थे।
यहाँ रसूल अल्लाह ﷺ की क़ियादत में 1,000 सहाबा का लश्कर मदीना से निकला। लेकिन रास्ते में मुनाफ़िकों का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबी अपने 300 साथियों को लेकर अलग हो गया, जिसके बाद मुसलमानों की संख्या सिर्फ 700 रह गई।
इस हालात को देखते हुए रसूल अल्लाह ﷺ ने उहुद पहाड़ को अपनी पीठ पर रखा ताकि दुश्मन पीछे से हमला न कर सके।
आप ﷺ ने पहाड़ी के एक अहम दर्रे (जिसे “जबल-ए-रुमात” कहा जाता है) पर 50 तीरंदाज़ों का एक दस्ता हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर रज़ि. की क़ियादत में तैनात किया।
आप ﷺ ने उन्हें सख्त हिदायत दी कि:
“तुम चाहे देखो कि हमें फतह मिल गई है या हमें परिंदे नोच रहे हैं, तुमने अपनी यह जगह हरगिज़ नहीं छोड़नी जब तक मैं खुद पैग़ाम न भेजूँ।”
जंग शुरू होते ही मुसलमानों ने बेहद बहादुरी से मुकाबला किया।
हज़रत अली, हज़रत हमज़ा और दूसरे सहाबा की बहादुरी के सामने काफ़िरों के कदम उखड़ गए और वे मैदान छोड़कर भागने लगे। यहाँ तक कि मुसलमान फतह के करीब पहुँच गए और माल-ए-गनीमत जमा करना शुरू कर दिया।
जब पहाड़ी पर मौजूद तीरंदाज़ों ने देखा कि काफ़िर भाग रहे हैं और मुसलमान माल-ए-गनीमत इकट्ठा कर रहे हैं, तो उन्होंने समझा कि अब जंग खत्म हो चुकी है।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर रज़ि. के मना करने के बावजूद, 50 में से लगभग 40 तीरंदाज़ अपनी जगह छोड़कर नीचे आ गए।
उसी वक्त ख़ालिद बिन वलीद (जो उस समय ईमान नहीं लाए थे और काफ़िरों के घुड़सवार दस्ते के कमांडर थे) ने दर्रे को खाली देखा। उन्होंने तुरंत पीछे से घूमकर इस खाली दर्रे से मुसलमानों पर अचानक और ज़बरदस्त हमला कर दिया।
इस अचानक हमले से मुसलमानों में अफरा-तफरी मच गई। भागते हुए काफ़िर भी वापस लौट आए। मुसलमान दोनों तरफ़ से घिर गए।
इसी दौरान यह झूठी अफवाह फैली कि (नऊज़ुबिल्लाह) रसूल अल्लाह ﷺ शहीद हो गए हैं, जिससे मुसलमानों के हौसले टूट गए।
लेकिन सहाबा की एक जमाअत ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर रसूल ﷺ की हिफाज़त की।
इस दौरान नबी करीम ﷺ के दंदान-ए-मुबारक शहीद हुए और आप ﷺ ज़ख्मी भी हुए।
इस जंग में हुज़ूर ﷺ के चाचा और इस्लाम के अज़ीम जरनैल हज़रत हमज़ा रज़ि. को वह्शी नामी गुलाम ने बड़ी बेरहमी से शहीद कर दिया।
जब मुसलमानों को मालूम हुआ कि रसूल ﷺ ज़िंदा हैं, तो वे दोबारा आपके आसपास जमा हो गए और आपको उहुद पहाड़ की ऊँचाई पर सुरक्षित जगह ले गए।
उस वक्त उहुद दो हिस्सों में बंट गया और रसूल ﷺ को अपनी आगोश में छुपा लिया।
अबू सूफ़ियान पहाड़ के करीब आकर नारे लगाने लगा, लेकिन मुसलमानों की मज़बूत पोज़िशन देखकर वह आगे बढ़ने की हिम्मत न कर सका और मक्का लौट गया।
इस जंग में 70 सहाबा-ए-किराम शहीद हुए, जिनमें हज़रत हमज़ा, हज़रत मुसअब बिन उमैर और हज़रत अनस बिन नज़र रज़ि. जैसे जलीलुल क़द्र सहाबा शामिल थे।
काफ़िरों का नुकसान: कुरैश के लगभग 22 या 23 लोग मारे गए।
मुशरिकीन-ए-मक्का ने इन शहीदों के जिस्मों के साथ बेहद बेरहमी से “मुस्ला” किया (यानी उनके कान और नाक काटे)। इन तमाम शहीदों को उहुद के मैदान में ही उनके खून से सने कपड़ों में दफन किया गया।
इनमें से कुछ मशहूर और जलीलुल क़द्र सहाबा के नाम ये हैं:
1. सैय्यदुश्शुहदा हज़रत हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब रज़ि.
आप रसूल ﷺ के सगे चाचा और रज़ाई भाई थे। अपनी बहादुरी की वजह से “असदुल्लाह” (अल्लाह का शेर) कहलाते थे। उन्हें जुबैर बिन मुतइम के गुलाम वह्शी ने नेज़ा मारकर शहीद किया, और बाद में हिन्दा ने उनका जिगर निकालकर चबाने की नापाक कोशिश की।
2. हज़रत मुसअब बिन उमैर रज़ि.
ये इस्लाम के पहले सफीर थे जिन्हें रसूल ﷺ ने मदीना तबलीग़ के लिए भेजा था। ग़ज़वा-ए-उहुद में ये मुसलमानों के झंडाबरदार थे। दोनों हाथ कट जाने के बावजूद इन्होंने झंडा सीने से लगाए रखा यहाँ तक कि शहीद हो गए।
3. हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर रज़ि.
ये उन 50 तीरंदाज़ों के अमीर थे जिन्हें दर्रे पर तैनात किया गया था। जब बाकी लोग नीचे उतर गए तो ये अपने कुछ साथियों के साथ डटे रहे और लड़ते हुए शहीद हो गए।
4. हज़रत हंज़ला बिन अबी आमिर रज़ि. (ग़सीलुल मलाइका)
इनकी शादी को सिर्फ एक दिन हुआ था कि जंग की पुकार आ गई। ये बिना ग़ुस्ल किए मैदान में पहुँचे और शहीद हो गए। रसूल ﷺ ने फरमाया कि फरिश्ते इन्हें ग़ुस्ल दे रहे थे।
5. हज़रत अनस बिन नज़र رज़ि.
जब यह अफवाह फैली कि रसूल ﷺ शहीद हो गए हैं, तो इन्होंने कहा:
“अगर रसूल ﷺ शहीद हो गए हैं तो उनके बाद ज़िंदा रहकर क्या करना? उठो और उसी चीज़ पर जान दे दो जिस पर उन्होंने जान दी!”
6. हज़रत अम्र बिन जमूह रज़ि.
ये एक टांग से लंगड़े थे, लेकिन बोले:
“खुदा की कसम! मैं चाहता हूँ कि अपने इस लंगड़ेपन के साथ जन्नत में चलूँ।”
और बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हो गए।
7. हज़रत सअद बिन रबीअ रज़ि.
उन्होंने आख़िरी सांसों में यह पैगाम दिया:
“अगर तुम ज़िंदा रहे और दुश्मन रसूल ﷺ तक पहुँच गया, तो अल्लाह के यहाँ तुम्हारा कोई बहाना कबूल नहीं होगा।”
रसूल ﷺ को उहुद पहाड़ से बेहद मोहब्बत थी।
आप ﷺ ने फरमाया:
“उहुद एक ऐसा पहाड़ है जो हमसे मोहब्बत करता है और हम उससे मोहब्बत करते हैं।”
एक बार रसूल ﷺ हज़रत अबूबक्र, हज़रत उमर और हज़रत उस्मान रज़ि. के साथ उहुद पहाड़ पर चढ़े तो पहाड़ खुशी से हिलने लगा।
आप ﷺ ने फरमाया:
“उहुद! ठहर जा, क्योंकि तुझ पर एक नबी, एक सिद्दीक और दो शहीद मौजूद हैं।”
हिन्दा बिन्त उत्बा (जो अबू सूफ़ियान की बीवी और अमीर मुआविया रज़ि. की वालिदा थीं) को हज़रत हमज़ा रज़ि. से बेहद नफरत थी क्योंकि बद्र में उसके बाप, भाई और चाचा मारे गए थे।
इसी नफरत में उसने वह्शी नाम के गुलाम को हज़रत हमज़ा को शहीद करने के लिए तैयार किया।
जब रसूल ﷺ अपने चचा हज़रत हमज़ा रज़ि. की लाश के पास पहुँचे और उनकी हालत देखी, तो आप ﷺ बेहद ग़मगीन हुए और आपकी आँखों से आँसू बह निकले।
जब रसूल ﷺ मदीना लौटे, तो आपने देखा कि हर घर से अपने शहीदों पर रोने की आवाज़ें आ रही हैं, लेकिन हज़रत हमज़ा रज़ि. का कोई रिश्तेदार मदीना में नहीं था।तब आपने फरमाया:“लेकिन अफसोस! हमज़ा का कोई रोने वाला नहीं है।”
रसूल ﷺ की जिंदगी में दो सबसे ज्यादा रंज वाले मौके थे
एक ताइफ़ का सफर और दूसरा ग़ज़वा-ए-उहुद।
जब हाजी साहेबान मदीना जाएँ, तो इन तमाम मुक़ामात की ज़ियारत ज़रूर करें और महसूस करें कि रसूल ﷺ को इस पहाड़ से कितनी मोहब्बत थी।
उहुद के मैदान में मौजूद 70 शहीदों के कब्रिस्तान पर जाकर फ़ातिहा पढ़ें, हमे भी बस वाले ने बताया हम सबने फातिहा पढ़ कर दुआ किए। इस जगह रसूल ﷺ के चचा और शहीदों के सरदार हज़रत हमज़ा रज़ि. भी आराम फरमा रहे हैं। चारों ओर दीवार उठाकर लोहे की बड़ी बड़ी जाली लगा दी गई है ताकि लोग आसानी से देख सकें और फातिहा पढ़ कर दुआ कर सकें। बस में जाओ तो बस कंडक्टर सब बातें बताते हुए चलता है।
मोहम्मद जाकिर घुरसेना जनता से रिश्ता रायपुर छत्तीसगढ़








