मकामे इब्राहिम, महज पत्थर नहीं, खुली निशानी है, इस्लामिक तवारिख की सबसे खूबसूरत और मोजज़ाओं में से एक है। : khabar 36 Garh is News Raipur Chhattisgarh


Mohammad Nazir Hossain chief editor
ख़बर 36 गढ़ न्यूज़ रायपुर: मकाम-ए-इब्राहिम (Maqam-e-Ibrahim) का वाकया इस्लामिक तवारिख की सबसे खूबसूरत और मोजज़ाओं में से एक है। यह पत्थर सिर्फ एक ऐतिहासिक निशानी नहीं है, बल्कि अल्लाह की तरफ से दी गई एक खुली निशानी (आयत) है, जो पैगंबर इब्राहिम (अलेहि सलाम) के अल्लाह के प्रति झुकाव, लगाव और मोहब्बत को बयां करती है।
इस पत्थर से जुड़ा पूरा वाकया इस तरह है:
1. काबा के तामीर का हुक्म:
जब अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम और उनके बेटे हज़रत इस्माइल (अलेहि सलाम) को **काबा (अल्लाह का घर)** दोबारा बनाने का हुक्म दिया, तो दोनों बाप – बेटे इस नेक काम में जुट गए। इस्माइल आसपास से पत्थर चुनकर लाते थे और इब्राहिम दीवारों की चिनाई करते थे।
2. दीवारें ऊंची होना और पत्थर का करामात:
जैसे-जैसे काबा की दीवारें ऊंची होती गईं, हजरत इब्राहिम के लिए ज़मीन पर खड़े होकर चिनाई करना मुश्किल हो गया। उस दौर में आज की तरह कोई मचान या सीढ़ियां नहीं थीं।
तब हज़रत इस्माइल एक खास पत्थर लेकर आए ताकि उनके वालिद उस पर खड़े होकर काम कर सकें। इसी पत्थर को मकाम-ए-इब्राहिम कहा जाता है। इस पत्थर के साथ दो बड़े मोज़ज़े (चमत्कार) हुए:
लिफ्ट की तरह ऊपर-नीचे होना: इब्राहिम जैसे ही इस पत्थर पर खड़े होते, दीवार की ऊंचाई के हिसाब से यह पत्थर अपने आप ऊपर उठ जाता। जब उन्हें और पत्थर या गारे की ज़रूरत होती, तो यह पत्थर अपने आप नीचे आ जाता।
पत्थर का मोम बन जाना: हालांकि वह एक सख्त पत्थर था, लेकिन अल्लाह के हुक्म से वह इब्राहिम के पैरों के नीचे मोम की तरह नर्म हो गया। इस वजह से इब्राहिम के दोनों पैरों के निशान उस पत्थर में गहराई से धंस गए।
3. इतिहास और इसकी हिफाज़त
काबा का निर्माण पूरा होने के बाद भी यह पत्थर वहीं रहा। सदियों तक यह पत्थर खुला रहा और लोग इसे छूकर बरकत हासिल करते थे।
हज़रत उमर (रज़ि.) का दौर: शुरुआत में यह पत्थर काबा की दीवार से बिल्कुल सटा हुआ था। लेकिन जब तवाफ (काबा के चक्कर काटने) करने वाले जायरीन की तादाद बहुत बढ़ गई, तो हज़रत उमर फारूक के दौर में इसे काबा की दीवार से थोड़ा पीछे हटाकर स्थापित किया गया, ताकि तवाफ करने वालों को रुकावट न हो।
मौजूदा स्वरूप: आज के समय में इस पवित्र पत्थर को एक बेहद खूबसूरत, सोने और शीशे के बने क्रिस्टल के ऊंचे ढांचे (Enclosure) में महफूज़ रखा गया है। काबा का तवाफ करने वाले हर इंसान को यह साफ़ नज़र आता है। इसमें पैरों के निशान आज भी देखे जा सकते हैं।
4. कुरान में ज़िक्र और धार्मिक महत्व
मकाम-ए-इब्राहिम का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि खुद अल्लाह ने कुरान में इसका ज़िक्र किया है। सुरह अल-बकराह (आयत 125) में अल्लाह का हुक्म है: “وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى“
“और मकाम-ए-इब्राहिम को नमाज़ की जगह बना लो।”
इसी हुक्म के तहत, आज भी जब कोई मुसलमान काबा का तवाफ (7 चक्कर) पूरा करता है, तो उसके लिए मकाम-ए-इब्राहिम के पीछे खड़े होकर दो रकात नमाज़ (वाजिब-उत-तवाफ) पढ़ना सुन्नत है। अगर भीड़ ज़्यादा हो, तो मस्जिद-अल-हरम में कही भी सामने खड़े होकर यह नमाज़ पढ़ी जा सकती है। मुझे सिर्फ एक दिन ही ऐसा मौका मिला बाकी दिन मकामे इब्राहिम के पीछे थोड़ा दूर पढ़ा। बाकी हजरे असवद के सामने भी मगरिब पढ़ा था जो मकामें इब्राहिम के बाजू ही है।
मोहम्मद जाकिर घुरसेना की रिपोर्ट, जनता से रिश्ता रायपुर छत्तीसगढ़








