लाखों हाजी यहां जमा होकर अल्लाह से दुआ, तौबा और इबादत करते हैं। यही दिन “यौम-ए-अरफ़ा” कहलाता है : khabar 36 Garh is News Raipur Chhattisgarh


Mohmmad Nazir Hossain chief editor
ख़बर 36 गढ़ न्यूज़ रायपुर: अराफ़ात का मैदान क्या है? Plain of Arafat इस्लाम का बहुत ही मुक़द्दस और अहम मैदान है, जो मक्का से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित है। इसे “मैदान-ए-अराफ़ात” और “जबल-ए-रहमत” (रहमत का पहाड़) के नाम से भी जाना जाता है। हज का सबसे बड़ा रुक्न (फ़र्ज़ हिस्सा) यही है। अगर कोई हाजी अराफ़ात में तय वक़्त पर मौजूद न हो, तो उसका हज पूरा नहीं माना जाता।
अराफ़ात नाम क्यों पड़ा?
“अराफ़ात” शब्द अरबी के “अरफ़ा” से निकला है, जिसका मतलब है “पहचानना” या “मुलाक़ात होना”। रिवायतों के मुताबिक जब हजरत आदम अलैहिस्सलाम और हजरत हव्वा रदि.अन्हा जन्नत से दुनिया में भेजे गए, तो उनकी मुलाक़ात इसी मैदान में हुई थी। इसलिए इसे अराफ़ात कहा गया।
हज में अराफ़ात की अहमियत
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
“अल-हज्जु अरफ़ा” यानी “हज तो अराफ़ात ही है।”
इस हदीस का मतलब यह है कि अराफ़ात में वुक़ूफ़ (ठहरना) हज का सबसे अहम हिस्सा है।
9 ज़िलहिज्जा को दुनिया भर के लाखों हाजी यहाँ जमा होकर अल्लाह से दुआ, तौबा और इबादत करते हैं। यही दिन “यौम-ए-अरफ़ा” कहलाता है, जो इस्लाम के सबसे अफ़ज़ल दिनों में से एक है।
जबल-ए-रहमत (रहमत का पहाड़)
Jabal al-Rahmah अराफ़ात के मैदान के बीच में मौजूद मशहूर पहाड़ी है। माना जाता है कि यहीं पर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम और हज़रत हव्वा की मुलाक़ात हुई थी। इसी जगह पर हजरत मोहम्मद मुस्तफा ﷺ ने अपने आख़िरी हज में “ख़ुत्बा-ए-हज्जतुल विदा” दिया था।
ख़ुत्बा-ए-हज्जतुल विदा
10 हिजरी में, रसूलुल्लाह ﷺ ने अराफ़ात के मैदान में एक बहुत अहम ख़ुत्बा दिया, जिसमें इंसानियत, बराबरी, औरतों के हुक़ूक़ और मुसलमानों की एकता का पैग़ाम दिया गया। लगभग 1 लाख से ज़्यादा सहाबा उस वक़्त मौजूद थे।
अराफ़ात में क्या किया जाता है?
हाजी 9 ज़िलहिज्जा की दोपहर से लेकर मग़रिब तक अराफ़ात में ठहरते हैं। इस अमल को “वुक़ूफ़-ए-अराफ़ात” कहते हैं।
इस दौरान:
नमाज़ पढ़ी जाती है
खूब दुआ की जाती है
तौबा व इस्तिग़फ़ार किया जाता है
तस्बीह और ज़िक्र किया जाता है
रो-रो कर अल्लाह से रहमत मांगी जाती है
कई लोग हाथ उठाकर घंटों दुआ करते रहते हैं। यह मंज़र बहुत रूहानी और दिल को हिला देने वाला होता है।
अराफ़ात के दिन की फ़ज़ीलत
हदीस में आता है:
“अराफ़ा के दिन से बढ़कर कोई दिन नहीं जिसमें अल्लाह सबसे ज़्यादा लोगों को जहन्नम से आज़ाद करता हो।”
जो लोग हज पर नहीं होते, उनके लिए भी इस दिन का रोज़ा बहुत अफ़ज़ल है। हदीस के मुताबिक अराफ़ा का रोज़ा पिछले और अगले साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बनता है।
मस्जिद-ए-नमिरा
मस्जिदे नमिरा अराफ़ात में मौजूद बहुत बड़ी और मशहूर मस्जिद है। यहीं से हज का ख़ुत्बा दिया जाता है और ज़ुहर व असर की नमाज़ एक साथ पढ़ाई जाती है।
अराफ़ात के बाद कहाँ जाते हैं?
मग़रिब के बाद सभी हाजी अराफ़ात से निकलकर मुजदलिफा जाते हैं, जहाँ रात गुज़ारते हैं और अगले दिन जमरात के लिए कंकड़ियाँ जमा करते हैं।
मोहम्मद जाकिर घुरसेना की रिपोर्ट जनता से रिश्ता रायपुर छत्तीसगढ़








