रायपुर

एक नेक-दिल सहाबी की हुस्न-ए-अख़लाक़ और ख़ुलूस-ए-नीयत की याद को ताज़ा करती है,जो पिछले 1400 सालों से मस्जिद-ए-नबवी में गवाही देती आ रही है।khabar 36 Garh is News Raipur Chhattisgarh

तुम हरगिज़ भलाई को नहीं पा सकते जब तक उस चीज़ को राह-ए-ख़ुदा में खर्च न करो जो तुम्हें सबसे प्यारी हो।”

यहां पहले कुआं हुआ करता था अब लाल संगमरमर से घेर दिए हैं और इसके ऊपर कालीन बिछा दिये हैं जहां अब नमाज़ होने लगी है।

Mohammad Nazir Hossain chief editor

ख़बर 36 गढ़ न्यूज़ रायपुर: हमको नागपुर से सीधे मदीने शरीफ लाया गया था बाकी हाजी जद्दा आकर मक्का मुकर्रमा पहुंचे। मस्जिदे नबवी में तिलावत करते बैठा था उसी दरम्यान कुछ लोग आकर कालीन (जानमाज) को उठाकर देखने लगे तो मैं भी वहां गया और उनसे पूछा कि क्या देख रहे हैं उन लोगों ने बताया कि यहां पहले कुआं हुआ करता था अब लाल संगमरमर से घेर दिए हैं और इसके ऊपर कालीन बिछा दिये हैं जहां अब नमाज़ होने लगी है। मस्जिद-ए-नबवी ﷺ में यह ख़ास मुक़ाम है जो आज कालीन के नीचे छुपा हुआ है। यहाँ ज़मीन में तीन संगमरमर के गोल घेरे बने हुए हैं। ये घेरे मस्जिद की बाकी सज़ावट से अलग और अनोखे हैं। इन घेरों के पीछे एक ऐसी कहानी छुपी है जो एक नेक-दिल सहाबी की हुस्न-ए-अख़लाक़ और ख़ुलूस-ए-नीयत की याद को ताज़ा करती है और जो पिछले 1400 सालों से मस्जिद-ए-नबवी में गवाही देती आ रही है।

यहां पहले कुआं हुआ करता था अब लाल संगमरमर से घेर दिए हैं और इसके ऊपर कालीन बिछा दिये हैं जहां अब नमाज़ होने लगी है। मस्जिद-ए-नबवी ﷺ में यह ख़ास मुक़ाम है जो आज कालीन के नीचे छुपा हुआ

हज़रत अबू तल्हा अंसारी رضي الله عنه आप अंसार-ए-मदीना के बड़े और मालदार सहाबी थे। अल्लाह तआला ने आपको खेतों, खजूरों के बाग़ों, ऊँटों और दौलत से नवाज़ा था। जब आपने इस्लाम कुबूल किया, तो आपने अपनी दौलत मुसलमानों में बाँट दी और कभी कंजूसी नहीं की।

आपकी तमाम जायदाद में एक चीज़ थी जो आपके दिल के बहुत क़रीब थी एक कुआँ, जिसे “बैरुहा” कहा जाता था। यह कुआँ मस्जिद-ए-नबवी के बिलकुल सामने था। इसका पानी साफ़, मीठा और शुद्ध था, जिससे पूरा मदीना फ़ैज़याब होता था।

सबसे ख़ास बात यह थी कि पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ ख़ुद इसी कुएँ का पानी पीते थे और वुज़ू करते थे। यही वजह थी कि यह कुआँ अबू तल्हा رضي الله عنه के लिए सबसे अज़ीज़ माल था क्योंकि इसमें नबी ﷺ की बरकत शामिल थी।

जब अल्लाह का हुक्म उतरा:👇
لَنْ تَنالُوا الْبِرَّ حَتَّى تُنْفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ
“तुम हरगिज़ भलाई को नहीं पा सकते जब तक उस चीज़ को राह-ए-ख़ुदा में खर्च न करो जो तुम्हें सबसे प्यारी हो।” (आल-ए-इमरान 3:92)

ये आयत सुनते ही हज़रत अबू तल्हा رضي الله عنه हाज़िर-ए-रसूल ﷺ हुए और बोले: “ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ! अल्लाह तआला ने हुक्म दिया है कि हम वही खर्च करें जो हमें प्यारा है। मेरे लिए सबसे प्यारी चीज़ यह “बैरुहा” है। मैं इसे अल्लाह के रास्ते में वक़्फ़ करता हूँ। इसे जहाँ अल्लाह और उसका रसूल बेहतर समझें, वहाँ खर्च कर दीजिए।” [#Sahih_Bukhari_1461]

ये बात सुनकर पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ बहुत ख़ुश हुए और फ़रमाया: “यह सौदा हमेशा फ़ायदे में रहेगा।”

यह कुआँ लंबे अरसे तक मुसलमानों के लिए सदक़ा-ए-जारीया बना रहा लोगों को पानी पिलाता, रहमत बाँटता रहा।

आज उसका निशान: जब मस्जिद-ए-नबवी का विस्तार हुआ, तो वह कुआँ मस्जिद की सरहद में आ गया और उसे बन्द कर दिया गया। आज जब आप किंग फ़हद गेट (Gate 21 और 22) से मस्जिद-ए-नबवी में दाख़िल होते हैं, तो बाईं ओर दूसरे और तीसरे खंभे के बीच कालीन के नीचे तीन गोल संगमरमर के घेरे दिखाई देते हैं वही जगह है जहाँ कभी बैरहा का कुआँ हुआ करता था।

यह निशान आज भी उस सहाबी की ईमान, मोहब्बत और सख़ावत की गवाही देता है, जिसने अपनी सबसे अज़ीज़ चीज़ अल्लाह की राह में कुर्बान कर दी।

मोहम्मद जाकिर घुरसेना की रिपोर्ट जनता से रिश्ता रायपुर छत्तीसगढ़

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