रायपुर

ईदे कुर्बां : त्याग और बलिदान की प्रेरक है बकरीद पर्व : khabar 36 Garh is News Raipur Chhattisgarh

कुर्बानी …. भावनाओं और विचारों की होती है।
कुर्बानी….. अपने अहम और खुद्दारी की होती है।
कुर्बानी…… कामनाओं और दुनियादारी की होती है।
कुर्बानी …. सांसारिक नेमतों और लज़्ज़तों की होती है।

Mohammad Nazir Hossain chief editor

ख़बर 36 गढ़ न्यूज़ रायपुर: दुनिया भर के मुसलमान ईदुल अज़हा के अवसर पर अपने जानवरों की कुर्बानी करके हर साल हज़रत इब्राहीम (अलै.) की सुन्नत ताज़ा करते हैं और त्याग और बलिदान की उस महान घटना को याद करते हैं जो आज से लगभग सवा पांच हज़ार वर्ष पहले अरब की भूमि पर अल्लाह के घर (काबा) के निकट पेश आई थी।
हज़रत इब्राहीम (अलै.) सपनों में खुदा के आदेश को महसूस करते हैं और इस्माईल (अलै.) जैसे आज्ञाकारी पुत्र के समक्ष स्वप्न कह सुनाते हैं। बेटा भी किस बाप का, आज्ञापालन के लिए सहर्ष तैयार हो जाता है और अल्लाह के आदेश को पूरा करने के उद्देश्य से अपनी गर्दन ज़मीन पर रख देता है।
यही वह क्षण था जब इब्राहीम (अलै.) के हाथ में छुरी थी और बेटे की गर्दन छुरी के नीचे थी। इब्राहीम (अलै.) ने अपने पुत्र-मोह की भावना की अनदेखी करते हुए ईश्वरीय आदेश का पालन करना ही चाहते हैं कि एक आकाशीय स्वर गूंजता है।

“हे इब्राहीम ! तूने अपना- स्वप्न सच कर दिखाया, हम आज्ञाकारियों को ऐसा ही बदला देते हैं ।” (कुरआन, 37:104-106 )

हज़रत इब्राहीम (अलै.) के सामने उसी क्षण एक दुम्बा पेश किया गया ताकि वे उस पर छुरी फेर दें और प्राण न्यौछावर करने के भाव को संतुष्ट करें। अल्लाह ने क़ियामत तक के लिए यह सुन्नत जारी कर दी ताकि दुनिया भर के मुसलमान हर साल उस दिन जानवरों के गले पर छुरी फेर कर उस कुर्बानी की याद ताज़ा करें, जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती।

दुनिया भर के मुसलमान लाखों की संख्या में उसी स्थल पर, मक्का की उसी पाक भूमि में इस कुर्बानी को हज के अवसर पर पेश करते हैं। हज़रत इब्राहीम (अलै.) असल में कुर्बानियों की एक लम्बी दास्तान का नाम है। इब्राहीम (अलै.) की जीवनी को यदि बलिदानों की व्याख्या कहा जाए, तो अनुचित न होगा। आप (अलै.) की पूरी ज़िन्दगी त्याग और बलिदान की कठिन आज़माईशों से भरी पड़ी हैं।
ईदे कुर्बां, जिसके इतिहास की एक संक्षिप्त झांकी हमारे सामने है, हम उसे केवल रस्मी ढंग से मनाते आये हैं। जानवरों की खरीददारी से लेकर गोश्त का बंटवारा और मेहमानदारी तक सब कुछ रस्मी ही होता है। एक दूसरे से बढ़कर दिखावा, अधिक मूल्य के जानवरों की खरीददारी, संबंध के आधार पर गोश्त का बंटवारा, आज हमारे दौर की वे बातें हैं, जिनको पूरा करना कभी-कभी फर्ज़ से भी अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है।
ईदुल फित्र यानी मीठी ईद से पहले रमज़ान का पूरा मुबारक महीना ईद की तैयारियों और नये कपड़ों की चिन्ता में गुज़र जाता है और रमज़ान के मुबारक महीने में ईद की कृत्रिम खुशियां ही हाथ आती हैं । हम व्यक्तिगत भावनाओं और सांसारिक चिन्ताओं में इतने घिरे रहते हैं कि सच्चाई का चेहरा ही छुपकर रह जाता है।
इसी तरह आज यदि हम ईदे कुर्बां पर नज़र डालते हैं तो हमें इसमें उस त्याग का बलिदान का कोई अंश दिखाई नहीं देता, जिसके नतीजे में एक अमल को व्यक्ति से लेकर क़ियामत तक आने वाली नस्लों के लिए सुरक्षित कर दिया गया। हज़रत इस्माईल (अलै.) की कुर्बानी इतिहास की एक महान घटना बन गई। जिसका कोई उदाहरण न इससे पहले दुनिया में देखा और न भविष्य में कभी देखेगा।

वास्तव में हज़रत इब्राहीम (अलै.) की जीवनी का अध्ययन कुर्बानी के भाव को समझने के लिए आवश्यक है । आप अल्लाह की खुशनूदी और प्रसन्नता के लिए माँ-बाप के प्रेम से वंचित हुए । उनकी धन-सम्पत्ति से वंचित हुए। परिवार व बिरादरी के सहयोग व समर्थन से दूर हुए। पारिवारिक गद्दी से वंचित हुए। अपने प्रिय देश को त्यागना पड़ा। अल्लाह के लिए नमरूद के द्वारा बनाई गई आग की भट्ठी में कूदकर अपने प्राण की बलि दी। अल्लाह की खुशनूदी के लिए ही अपनी पत्नी और अपने इकलौते बच्चे को एक निर्जन मरूस्थल में ले जाकर डाल दिया । जब यही बच्चा तनिक बड़ा हुआ और कुछ बनने योग्य हुआ तो आदेश हुआ कि अपने हाथों से उसके गले पर छुरी फेर कर दुनिया के हर सहारे और हर ताल्लुक से कट जाओ और मुस्लिम हनीफ बनकर उस कामिल इन्सान की तस्वीर पेश करो, जो आज्ञापालन के उस रास्ते में अल्लाह को दरकार है।

वास्तव में इस्लाम का अर्थ ही है पूर्ण आज्ञापालन, मुकम्मल सुपुर्दगी और सच्ची वफादारी । कुर्बानी का वह अमल, जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती, उसी से संभाव हो सकता है, जिसने वास्तव में अपने पूरे जीवन का हर मामला अपने रब की वफदारी में तय किया हो और जिसने अपना सब कुछ खुदा के हवाले कर दिया हो।

यहाँ कुर्बानी का यह बड़ा अमल असल में हमें अपनी ज़िन्दगी पर नज़र डालने और उसे बड़ी ईमानदारी से अध्ययन करने की मांग करता है कि हमारी जिन्दगी जिसमें हर साल रस्मी अन्दाज़ में कुर्बानी जारी है, क्या वास्तव में यह गवाही भी दे रही है कि हम खुदा के मुस्लिम और वफादार हैं ? और हमने अपने जीवन के कुछ क्षण खुदा के हवाले किये हैं ? या बस हर साल केवल जानवरों का खून बहाकर कुर्बानी का फ़रीज़ा पूरा कर लेते हैं ?

हम केवल रस्मी कुर्बानियों को पूरा करके इब्राहीम (अलै.) की सुन्नत को ताज़ा नहीं कर सकते और उस संकल्प पर पूरे नहीं उतर सकते, जो कुर्बानी करते समय अपने रब से करते हैं । वे संकल्प हमारे दैनिक जीवन में शामिल नहीं हैं। देखने में तो यही आभास होता है कि मैंने पूरी एकाग्रता के साथ अपना रूख ठीक उस खुदा की तरफ कर लिया है जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है। और जो दोनों जहान का मालिक है। निस्सन्देह मेरी नमाज, मेरी कुर्बानी, मेरी जिन्दगी और मेरी मौत सब उस रब्बुल आलमीन के लिए है। उसका कोई भागीदार नहीं और मैं मुस्लिम और फरमाबरदार हूँ।

ऐ अल्लाह ! यह तेरे सामने हाज़िर है और तेरा ही दिया हुआ है।”

कुर्बानी की इन्हीं भावनाओं को दिल व दिमाग में बिठा लेना कुर्बानी की असल रूह और उसका असल उद्देश्य है । यदि ये भावनाएं और इरादे न हों और खुदा की राह में कुर्बान होने की कामना और इच्छा न हो, खुदा की सम्पूर्ण पैरवी और सब कुछ उसके हवाले कर देने का हौसला न हो, तो केवल जानवरों को ज़िब्ह करना, गोश्त खाना, और उसे तक्सीम करना कुर्बानी नहीं है, बल्कि एक आयोजन है, जिसको मानकर हम इब्राहीम (अलै.) की सुन्नत को ताज़ा करना समझते हैं।

वास्तव में यह आज्ञापालन और फरमाबरदारी तक्वा (ईश-भय) को दर्शाती है। बन्दा अपने रब से निकट होने का प्रदर्शन ही नहीं करता, निकट भी होता है। बन्दा केवल शब्दों का खजाना ही नहीं लुटाता, बल्कि अपने दिल को अल्लाह की रज़ा और उसकी खुशनूदी के लिए राजी भी कर लेता है, तो फिर उससे वही अमल होने लगते हैं जो उसका रब उससे चाहता है।

कुर्बानी …. भावनाओं और विचारों की होती है।

कुर्बानी….. अपने अहम और खुद्दारी की होती है।

कुर्बानी…… कामनाओं और दुनियादारी की होती है।

कुर्बानी …. सांसारिक नेमतों और लज़्ज़तों की होती है।

अल्लाह के सामने यह संकल्प दोहराने के बाद कि मैं रब्बुल आलमीन (पूरी दुनिया के रब) का मुस्लिम हूँ, इस बात की गुंजाईश कहां है कि हम जिस तरह का जीवन चाहें, बिताएं? नाजायज को अपने लिए जायज बना लें। अपने मनमाने तौर तरीके अपनाएं।

नहीं, यह कुर्बानी नहीं है। अल्लाह का दीन हमारी पूरी शख्सियत और पूरी जिन्दगी की मांग करता है। वह चाहता है कि आप उसकी बन्दगी के साथा किसी और की बन्दगी न करें। खुदा के जिस सच्चे और अच्छे बन्दे की याद हम कर रहे हैं, उनको देखें कि वे किस तरह अपने जीवन के हर मामले में मुस्लिम हनीफ थे। और उनका जीवन अल्लाह की इताअत और फरमाबरदारी का वह बेमिसाल नमूना है जो असल में ईदे कुर्बा की मांग है।

नस्लों के प्रशिक्षण, घर और परिवार की जिम्मेदारी महिलाएं ही होती हैं। एक मुस्लिम महिला ही एक अच्छे परिवार की आधारशिला रख सकती है। परिवार से ही समाज को ऐसे लोग मिलते हैं, जो बन्दगी की भावनाओं से सरशार होते हैं। यदि आज हम समाज-सुधार की बातें करते हैं, तो हमारी दृष्टि जीवन के इस दृष्टिकोण की ओर कम ही जाती है, जिस पर चलना, जिस पर अमल करना असल में सांसारिक कल्याण के लिए भी आवश्यक है औ परलोक की सफलता की शुभ सूचना भी।

अल्लाह की बन्दगी का जैसा माहौल चाहिए, उसे बनाना ही आज की घरेलू महिलाओं की सबसे बड़ी सफलता है। इसी सफलता को प्राप्त करने के लिए बीबी हाजरा का नमूना सामने रखना होगा, जिन्होंने अरब के रेगिस्तानों में मासूम इस्माईल के साथ पति द्वारा अकेला छोड़े जाने पर पति से यह नहीं पूछा कि हमें किसके सहारे पर छोड़कर जा रहे हो। औरत का यह वही रूप है जो इस्लाम को दरकार है। केवल और केवल खुदा के बन्दे बनकर स्वयं को उसके हवाले कर देना इब्राहीम (अलै.) की पैरवी है।

क़ियामत तक के लिए सफा व मरवा की सई (दौड़), कंकड़ियों का मारना, जैसे सभी आमाल हज़रत इब्राहीम (अलै.) से जुड़े हैं, जिनकी पत्नी, उनकी इन कुर्बानियों और मुहब्बतों की लाज़वाल दास्ताने हयात में व्यावहारिक रूप में शरीक थीं। आज ईदे कुर्बां हमसे यही मांग करती है। इसको पूरा किये बिना हम कुर्बानी
के बड़े पुरस्कार से लाभान्वित नहीं हो सकते।
मुबीन खान (रुक्न-ए-शूरा जमाअत-ए- इस्लामी रायपुर, छत्तीसगढ़)

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