तवाफ़-ए-ज़ियारा : शुरुआत हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दौर से जुड़ी है और नबी ﷺ ने इसे अपने हज्जतुल विदा में अदा करके उम्मत के लिए हमेशा के लिए सुन्नत बना दिया: khabar 36 Garh is news Raipur Chhattisgarh


Mohammad Nazir Hossain chief editor
ख़बर 36 गढ़ न्यूज़ रायपुर: हाजी मोहम्मद जाकिर घुरसेना साहब रायपुर लिखते हैं ये तस्वीर तवाफ़-ए-ज़ियारा (तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा) का है। 11 जिलहिज्जा को मै हरम शरीफ गया था उसी दरम्यान लिया था।
तवाफ़-ए-ज़ियारा जिसे तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा भी कहा जाता है, हज का एक जरूरी (फ़र्ज़) रुक्न है। हाजी 10 ज़िलहिज्जा को मिना में जमरात पर कंकरी मारने, क़ुर्बानी करने और सिर मुंडवाने के बाद मक्का आकर ख़ाना-ए-काबा का सात चक्कर लगाते हैं। सई करते हैं और सिर नहीं मुंडाते यही तवाफ़-ए-ज़ियारा कहलाता है। जिस किसी हाजी ने खाने काबा की तवाफ़ नहीं की, तो उसका हज पूरा नहीं माना जाता। बताया जाता है कि हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके साहबजादे हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से काबा को फिर से बनाया या तौसी किया और लोगों को हज के लिए बुलाया।
कुरआन में अल्लाह फरमाता है:
“और लोगों में हज के लिए ऐलान कर दो, वे तुम्हारे पास पैदल और दुबली ऊंटनियों पर दूर-दूर के रास्तों से आएंगे।”
(सूरह अल-हज्ज 22:27)
इसके बाद अल्लाह ने हुक्म दिया:
“फिर उन्हें चाहिए कि वे अपना मैल-कुचैल दूर करें, अपनी नज़रें पूरी करें और इस घर (काबा) का तवाफ़ करें।”
(सूरह अल-हज्ज 22:29)
मुफस्सिरीन के अनुसार इस आयत में तवाफ़-ए-ज़ियारा की ओर संकेत है।
10 ज़िलहिज्जा से शुरू होता है।
10, 11 और 12 ज़िलहिज्जा तक करना सुन्नत समय है।
जरूरत होने पर बाद में भी किया जा सकता है, लेकिन बिना किसी ठोस वजह से देर करना गुनाह का सबब माना जाता है। इसलिए हर हाल में इन तीन दिनों के भीतर कर लेना ही चाहिए। कोई कोताही माफी के लायक नहीं माना गया है। तवाफे ज़ियारा
ठीक वैसे ही किया जाता है जैसे दूसरे दिनों में होता है। खाने काबा का सात चक्कर लगाने के बाद नफ़ल नमाज़ और सफा मरवाह का सात चक्कर। हमारे ग्रुप के कुछ हाजी 10 जिलहिज्जा को ही तवाफे ज़ियारा कर लिए थे, थकान की वजह से मैं और दूसरे हाजी साहेबान 11 को किए।
हाजी तमत्तुअ या किरान करने वाला हो तो सई भी करता है। हमे जामा मस्जिद रायपुर में वहां के खतीबो ईमाम हजरत हाफिज कारी सैय्यद अशफाक अंजुम साहब ने ट्रेनिंग के दौरान बताया गया था कि छत्तीसगढ़ से लगभग अधिकतर या सभी हाजी हज्जे तमत्तुअ करते हैं इसलिये तवाफ के बाद नफ़ल नमाज़ और सफा मरवाह का सई भी करना पड़ता है।
कुरआन की रोशनी में महत्व
अल्लाह तआला फरमाता है:
“और मेरे घर को तवाफ़ करने वालों, क़याम करने वालों, रुकू और सज्दा करने वालों के लिए पाक रखो।”
(सूरह अल-बक़रा 2:125)
यह आयत तवाफ़ की अज़मत और उसकी इबादती हैसियत को वाज़ेह करती है। यानी स्पष्ट करती है। हजरत
मुहम्मद मुस्तफा ﷺ ने अपने हज्जतुल विदा में तवाफ़-ए-ज़ियारा किया और उम्मत को भी इसका तरीका सिखाया।
हदीस में है:
“तुम मुझसे अपने हज के तरीके सीख लो।”
(सहीह मुस्लिम)
एक अन्य हदीस में है:
“काबा का तवाफ़ नमाज़ के समान है, फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें बात करने की अनुमति है।”
(तिर्मिज़ी)
सुन्नत से साबित है कि
नबी ﷺ ने 9 ज़िलहिज्जा को अरफ़ात में वक़ूफ किया, रात मुज़दलिफ़ा में गुज़ारी।
10 ज़िलहिज्जा को जमरात पर कंकरी मारी,क़ुर्बानी की,सिर मुंडवाया,फिर मक्का जाकर, तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा किया।
यही तरीका सुन्नत माना जाता है।
तवाफ़-ए-ज़ियारा केवल काबा के चक्कर लगाने का नाम नहीं, बल्कि यह अल्लाह के वहदानियत और सिवाय अल्लाह के इबादत के लायक कोई नहीं है इस बात की भी तस्दीक करता है। साथ ही हज पूरे होने की भी अलामात होता है। हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और मेरे आका हजरत मुहम्मद मुस्तफा ﷺ की सुन्नत की याद ताज़ा करता है।
इंसान को यह एहसास दिलाता है कि उसकी ज़िंदगी का मकसद सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की इबादत है।
तवाफ़-ए-ज़ियारा (तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा) हज का फ़र्ज़ रुक्न है। इसका आधार कुरआन, हदीस और नबी ﷺ की सुन्नत में मौजूद है। इसकी शुरुआत हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दौर से जुड़ी है और नबी ﷺ ने इसे अपने हज्जतुल विदा में अदा करके उम्मत के लिए हमेशा के लिए सुन्नत बना दिया। यह हज के कंप्लीट होने की भी निशानी मानी जाती है।
अल्लाह तआला सभी हाजियों का हज मक़बूल फरमाए और हमें तवाफ़ की रूहानी हक़ीक़त समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।








