हज का वो नूरानी सफर, जिसका हिस्सा मै भी बना: ज़ाकिर घुरसेना: khabar 36 Garh is news Raipur Chhattisgarh


Mohammad Nazir Hossain chief editor
ख़बर 36 गढ़ न्यूज़ रायपुर: मशहूर शायर अल्लामा इकबाल ने ठीक ही कहा है कि एक ही सब में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़, न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा नवाज़। 51 दिनों की सफर के बाद 19 जून को वापस रायपुर पहुंचा। नागपुर एयरपोर्ट में छत्तीसगढ़ राज्य हज कमेटी के चेयरमैन मिर्ज़ा एजाज़ बेग और उनके साथियों ने सभी हाजियों का गुलाब देकर इस्तकबाल किया। नागपुर के नवजवानों ने भी हाजियों की खिदमत में कमी नहीं की। मक्का मुकर्रमा और मदीना मुनव्वरा में बहुत ही अच्छा इंतजाम सऊदी हुकूमत ने किया था। एक साथ 17 लाख लोगों के लिए इंतजाम करने में अगर थोड़ी कमी रह जाए तो उसे कमी नहीं बोला जाता देखा जाए तो कोई कमी नहीं थी, सब कुछ ठीक था।
चंद लोगों के साथ हजारों साल पहले एक मुकद्दस सफर का आगाज हुआ था, जो सिर्फ अल्लाह की रजा और उसके पैगाम की खातिर ही था उस वक्त शायद ही किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक दिन यह कारवां पूरी कायनात के करोड़ों दिलों की धड़कन बन जाएगा। हाजियों की तादात को देखकर तो ऐसा ही लगता है और दिल खुश भी हो जाता है। बताया जाता है कि दुनिया में सबसे पहला हज हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम और उनके साहबजादे हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम ने किए थे। अल्लाह के हुक्म पर उन्होंने खाना ए काबा का तौसी रिनोवेशन कर अल्लाह के हुक्म से ही लोगों को हज करने की दावत भी उन्होंने दिए थे।
इसके अलावा रिवायतों के मुताबिक हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने भी खाना ए काबा की तवाफ़ की थी और हज के अरकान किए थे। एक रिवायत के मुताबिक यह भी बताया गया है कि पैगंबर हजरत मुहम्मद मुस्तफा सअव ने सबसे पहला हज 9 हिजरी (631 ईस्वी) में हज़रत अबूबकर सिद्दीक (रज़ियल्लाहु अन्हु) और कुछ सहाबियों के साथ किए थे।
आज, जब हम हरम शरीफ और मस्जिदे नबवी की फिजाओं और अराफात के मैदान में उस ईमान की चमक और रूहानी मंजर को देखते हैं तो रूह तक कांप उठती है, यकायक दिल रो पड़ता है और दिल की गहराइयों से सिर्फ दुआ ही निकलती है। यह सिर्फ एक मजहब नहीं बल्कि वह मोहब्बत है जिसने नस्लों, रंगों और सरहदों की खाई को पाटकर पूरी उम्मत को एक लाइन में खड़ा कर दिया है जहां न छोटा न बड़ा, न कोई काला न कोई गोरा सबको एक तसबीह के दानों की तरह पिरो दिया है।
हज का यह सफर हमें यकीन दिलाता है कि सच्चाई का रास्ता भले ही तन्हा शुरू हो, लेकिन अल्लाह उसे एक दिन पूरी दुनिया में फैला देता है, जो आज हम सब देख रहे हैं।
अल्हम्दुलिल्लाह, हम इस हज के अजीम सफर का हिस्सा बने थे ये हमारी खुशनसीबी है।
यह इस्लाम के पांच रुक्न या सुतून में से एक है, जो हर साहिबे निसाब मुसलमान के लिए जिसे अपने हयात रहते तक कम से कम एक बार पूरा करना जरूरी है। आलिमों के मुताबिक हमारे आका हुजूर अकरम स अ व ने अपनी जिंदगी में सिर्फ एक बार ही हज किए थे, इसलिए साहिबे निसाब मुसलमान को एक बार हज करना जरूरी है। अगर मेरे आका पैगंबर हजरत मोहम्मद मुस्तफा सअव कई बार हज करते (चाहते तो कर सकते थे)तो यहां पैसे वाले हर साल हज में चले जाते लेकिन आपके इस सुन्नत को बहुत कम लोग फालो करते हैं और लोगों को बताते फिरते भी हैं कि मै तीसरी बार हज में आ रहा हूं तो कोई चौथी बार बता रहा है तो कोई बोल रहा पांचवी बार। खैर इस बात पर बहस तो हो नहीं सकती क्योंकि उस दर पर बार बार जाने का मन करता ही है जितने बार जाओ कम लगता है। बहरहाल यह हर उस मुस्लिम मर्द औरत पर फर्ज है जो सेहत याफ़्ता होने के साथ साथ साहबे हैसियत हो। हज मुस्लिम लोगों की एकजुटता दिखाने के साथ साथ सिर्फ अल्लाह पर भरोसा होने का भी सबब है। यानी अल्लाह की वहदानियत पर यकीन पुख्ता भी करता है।
हज की यह रस्म हजारों सालों से यानि कि हजरत इब्राहीम अ स के जमाने से अल्लाह के हुक्म से चली आ रही है जिसमें अलग अलग भाषा बोली के लाखों लोग एक जगह खुशी खुशी जमा होते हैं। और यहां पर हज के अरकान को पूरा कर हाजी कहलाते हैं।हज के पांच दिन अहम होते हैं जिसके बारे में हमें हज कमेटी रायपुर द्वारा, जामा मस्जिद रायपुर में ईमाम साहब द्वारा फिर दावते इस्लामी के नुमाइंदो के जरिये ट्रेनिंग मिली थी। उसी के मुताबिक हम सब अरकान पूरे किए।
अल्लाह ताआला से गुज़ारिश है कि हर मुसलमान को हाजी नमाजी बनाए और हम सब के हज को कुबूल फरमाए… आमीन सुम्मा आमीन (घुरसेना)









